
नारायना हास्पिटल में तीन दिनों का यादगार अनुभव
माता जी की आंखों के ऑपरेशन के लिए मैं कानपुर के पनकी स्थित नारायना हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर गया। वहां मैं माता जी का तीमारदार बनकर तीन दिन रुका। इस दौरान मैंने अस्पताल में तीमारदारों की तकलीफें, चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ, सफाई कर्मियों के कामकाज को नजदीक से देखा और व्यवस्थाओं को महसूस किया। इसलिए ये अनुभव साझा कर रहा हूं। क्योंकि मेरे जैसे कई लोग इन हालातों से रोज दो-दो हाथ करते हैं।

अश्वनी प्रताप सिंह
मेरी माताजी (कमला देवी) की उम्र करीब 80 साल है। कई महीनों से उनका स्वास्थ्य गड़बड़ चल रहा है। आंखों में मोतियाबिंद था, इसलिए मैंने अपने संपादक दिग्विजय सिंह से सलाह ली कि कहां ऑपरेशन करवाना बेहतर रहेगा। क्या खर्च आएगा। खर्च के नाम पर ध्यान आया कि माताजी की उम्र के हिसाब से उनका आयुष्मान कार्ड भी पिछले कई सालों से बन रहा है लेकिन उसका कोई उपयोग नहीं हो रहा। इस पर कई अस्पतालों के नामों की सूची के बाद कानपुर के पनकी स्थित नारायना हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में ऑपरेशन करवाने का मानस बनाया। हालांकि नारायना अस्पताल मेरे लिए बिल्कुल नया था, मुझे तो यह भी नहीं पता था कि यह किस जगह पर है। लेकिन मैंने मन बना लिया था कि यहीं पर ऑपरेशन करवाएंगे। जिस दिन ऑपरेशन के लिए जाना था उस दिन मौसम का रुख बदल गया और एकाएक भीषण सर्दी शुरू हो गई। बात आई गई हो गई, लेकिन माताजी की तकलीफ लगातार बढ़ रही थी। करीब दो माह बाद 27 जनवरी 2026 को मैंने तय किया कि आज ऑपरेशन करवा ही देते हैं। मैंने सोचा था जाएंगे, जांचें होंगी और ज्यादा से ज्यादा 28 जनवरी को अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी। चूंकि मेरी माताजी गांव (मनेथू ब्लॉक सरवनखेड़ा) में थी जो कि अस्पताल से करीब 22 किमी दूर है। इसलिए मैंने एक ऑटो की और उनकी दवाओं के साथ कुछ सामान एक थैले में डालकर अस्पताल के लिए निकल पड़ा। साथ में मेरे बड़े बाई राजे सिंह भी थे। हम दोनों लोगों को पनकी तक का रास्ता पता था लेकिन नारायना अस्पताल कहां है इसकी जानकारी नहीं थी, लेकिन ड्राइवर को अस्पताल का रास्ता पता था। जब हम पनकी पड़ाव से कल्यानपुर वाले मार्ग पर आए और एक गली नुमा मार्ग से अस्पताल के लिए घूमे तो मुझे लगा शायद मैंने यहां माताजी के ऑपरेशन का गलत निर्णय ले लिया। आगे बढ़े और बगल में निर्माणाधीन इमारत देखकर पछतावा और बढ़ गया। खैर ड्राइवर ने अस्पताल के मुख्य द्वार से कुछ पहले उतारा और चला गया। उतरने के बाद बड़े भइया ने प्रश्नवाचक नजरों से मेरी ओर देखा और बोले, यहीं चलना हैं, मैंने सिर्फ सिर हिलाया और माताजी को सहारा देकर अंदर की ओर बढ़ गया। अंदर पहुंचा तो खैर एक बड़े अस्पताल जैसा माहौल नजर आया। मन में एक संतुष्टि का भाव आया। मैंने संपादकजी को फोन किया और बताया कि सर, मैं अस्पताल पहुंच गया। उन्होंने मुझे अस्पताल के एक सज्जन का नंबर दिया, जो शायद वहीं काम करते थे बोले इन्हें फोन कर लो ये मदद कर देंगे। मैंने उन्हें फोन किया तो वह बोले रिसेप्शन में मेरी बात करा दो, वहां तीन चार कतारों में करीब 15 से 20 लोग लाइन में खड़े थे, काफी जद्दोजहद के बाद एक मैडम को मैं फोन देकर बात कराने में सफल हुआ। उन्होंने बात की और बोलीं आप यहां से पर्चा बनवा लीजिए। लेकिन वहां नंबर की मारामारी थी, मेरे बगल में खड़े शख्स से कार्मिक कह रहा था, लाइन से आइए नहीं तो खड़े ही रहेंगे। इसके बाद भी मैं इंतजार करता रहा कि मैडम शायद पर्चा बनवाकर दे दें। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैंने उन सज्जन को दोबारा फोन किया, तो वह बोले, आप पर्चा बनवाकर फोन करो फिर मैं बताता हूं। इस पर मैं माताजी के पास आया और भइया से कहा आप घर जाओ, माता जी से आयुष्मान कार्ड लिया और लाइन में लग गया। खैर करीब 30 मिनट बाद मेरा नंबर आ गया और उनका पर्चा बन गया। मुझे प्रथमतल में जाने को कहा गया। अब माताजी को पकड़कर जैसे-तैसे मैं प्रथमतल पर सीढ़ियों से ले गया। जहां उनकी आंखों की जांच होनी थी, वहां डॉ. राजीव शुक्ला को पर्चा जमा दिया। उन्होंने शांतभाव से कहा आप बैठिए, अभी आपको बुलाते हैं। करीब पौन घंटे बैठने के बाद हमारा नंबर आया। वहां मौजूद स्टाफ ने बड़े ही सरल स्वभाव के साथ माताजी की आंखों की जांच की। कुछ स्थिति स्पष्ट नहीं हुई तो उन्होंने कहा आप कुछ देर और बैठें एक बार पुन: जांच करनी होगी। कुछ देर बाद फिर उन्होंने जांच की।
डॉक्टर ने शांति से जानी मरीज की हिस्ट्री
जांच रिपोर्ट के साथ डॉ. रुचि प्रिया के पास भेज दिया। वहां से चंद कदम दूर ही डॉ. रुचि प्रिया का केबिन था। मैं माताजी को लेकर उनके पास गया, तो उन्होंने बड़े ही धैर्य और शांत स्वभाव के साथ माताजी की पूरी हिस्ट्री जानी और जांच की। यहां आने का निर्णय गलत नहीं था। इधर जांच के बाद उन्होंने स्टाफ से एक दो जांचे करवाई और कुछ जांचे मुझे पर्चे में लिखकर दे दी और मुझे दूसरे दिन बुलाया। उनकी जांच के बाद मुझे भरोसा हुआ कि हम सही जगह आए हैं। डॉ. रुचि प्रिया ने कुछ जांचें खाली पेट लिखी थी, इसलिए 28 जनवरी 2026 को हम सुबह 10 बजे ही अस्पताल पहुंच गए। वहां मैंने काउंटर पर पूछ लिया कि लैब कहां हैं, तो उन्होंने कहा चौथी मंजिल में। अब मैंने सोचा माताजी ऊपर कैसे जाएं, क्योंकि लिफ्ट में जाने में उनको उलझन होती थी, फिरभी मैं जैसे-तैसे उन्हें लिफ्ट से चौथी मंजिल ले गया। वहां भी काफी चलना पड़ा। जो उनके लिए काफी मुश्किलों भरा रहा। जब हम वहां पहुंचे तो पता चला कि यहां सिर्फ लैब है जांच नीचे होगी। अब मुझे अपने आप पर ही गुस्सा आ रहा था। माताजी लिफ्ट से वापस जाने में कतरा रहीं थीं। फिर एक मंजिल हम सीढ़ियों से उतरे। वह ज्यादा थक गईं तो उन्होंने लिफ्ट से चलने की सहमति दी। लेकिन लिफ्ट तक जाने में उन्हें दो जगह बैठना पड़ा। खैर जैसे-तैसे हम नीचे पहुंचे और करीब 20 मीटर चलने के बाद जांच केंद्र पर पहुंचे। वहां पहुंचने पर पता चला कि पहले पैसे जमा होंगे उसकी रसीद के बाद ही सैम्पल लिए जाएंगे। मैं माताजी को वहीं बैठाकर काउंटर पहुंचा वहां, 1400 कुछ रुपये देकर बिल कटवाया। तब जाकर सैंपल लिए गए। सैंपल देकर हम फिर प्रथम तल पर डॉ. रुचि प्रिया के पास गए। वहां पहुंचते ही उन्होंने माताजी की आंख का सीटी स्केन किया। और माताजी को भर्ती करने की सहमति दी।
नर से नारायण की सेवा का ध्येय
डॉक्टर की सहमति के बाद हम पुन: आयुष्मान काउंटर पहुंचे। इसके बाद कुछ देर लाइन में लगने के बाद भर्ती पर्चा बना। भर्ती पर्चा बनते ही अस्पताल की सेवाएं मिलने शुरू हो गई। तुरंत ही एक वार्डबॉय आया और माताजी को व्हीलचेयर से लेकर एमरजेंसी वार्ड पहुंचा, वहां एक बेड में माता जी को बैठा दिया और जांचें शुरू हो गई। इसी बीच एक एक्सीडेंटल केस एमरजेंसी में आ गया। माताजी ने खून से लथपथ मरीज को देख लिया तो उन्हें उलझन होने लगी। लेकिन इस दौरान मुझे अस्पताल में नर से नारायण की सेवा का ध्येय देखने को मिला। यहां गंभीर हालत में आए घायल के साथ कोई नहीं था, लेकिन बिना किसी पूछताछ के उसका तुरंत प्राथमिक उपचार शुरू कर दिया गया। इस दौरान अस्पताल प्रबंधतंत्र से आए एक सज्जन ने नर्सिंग स्टाफ को निर्देश दिए कि किसी परिजन का इंतजार न करें और घायल का स्वयं पर्चा बनवाकर उपचार शुरू करें। यहां की यह व्यवस्था देखकर मेरे मन में संतोष के भाव उत्पन्न हुए। खैर कुछ देर बाद माता जी को एक वार्डबॉय ने तृतीय तल पर भर्ती करवा दिया। और 29 जनवरी को उनके ऑपरेशन की तिथि तय हुई, और तय समय पर माताजी सहित पांच मरीजों के डॉ. रुचि प्रिया और उनकी टीम ने सकुशल ऑपरेशन कर दिया। दूसरे दिन यानि 30 जनवरी को जांच के बाद छुट्टी दे दी गई। ऐसे में एक रात रुकने की तैयारी से अस्पताल पहुंचा मैं तीन दिन उसी हालत में अस्पताल में ही गुजारने पड़े। अस्पताल में गुजरा एक-एक लम्हा अपनी अलग ही छाप छोड़ता है।
अस्पताल की खूबियां और खामियां
अस्पताल का हर कार्मिक डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, वार्डब्याय, चतुर्थ श्रेणी सभी सरल स्वभाव के हैं। जो मरीजों से काफी विनम्र व्यवहार करते हैं। साफ-सफाई की व्यवस्था भी अच्छी है। लैट-बाथ व्यवस्था भी ठीक है लेकिन अस्पताल देहात क्षेत्र से जुड़ा है, ऐसे में उनकी सुविधा के अनुसार एक-दो देसी लैटबाथ होने चाहिए जो उन्हें सुविधा जनक लगते हैं और साफ-सफाई भी ज्यादा रहती है। साथ ही रात में निगरानीतंत्र और बेहतर होना चाहिए। रात के समय एकाएक पूरे अस्पताल की बिजली गुल हो जाती है दो रातों में दोनों दिन यह हुआ। एक बार तो करीब पांच-पांच मिनट के लिए पूरा अस्पताल अंधेरे में डूबा नजर आया। हो सकता है यह किसी फाल्ट की वजह से हुआ हो। दूसरा अस्पताल में जो खाना मरीजों को दिया जाता है वह बेहतर है उसमें कोई खामी नहीं है लेकिन उसकी पैकिंग थोड़ा विचलित करती हैं क्योंकि काली प्लास्टिक सबसे खराब श्रेणी की होती है, और उसमें मरीजों का खाना पैक होना सही नहीं लगा। खैर छोटी-मोटी खामियां हर जगह होती हैं। बाकी अस्पताल सुविधाजनक और सस्ता है। अन्य जगहों की तरह यहां अस्पताल के अंदर की कैंटीन में भी लूट नहीं है कि दो की चीज चार की मिले।

अश्वनी प्रताप सिंह
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